Wednesday, September 10, 2014

नहीं रहे चाचा चौधरी के ‘प्राण’


साल 1994 में गर्मी की छुट्टियां अभी शुरु ही हुई थीं...कुछ दोस्त अपने मम्मी पापा के साथ छुट्टियां बिताने अपने अपने घरों को जाने की तैयारियां कर रहे थे...तो कुछ यूपी के उस छोटे से जिले में रहकर जहां हमारे पिता जी सरकारी नौकर थे...धमाचौकड़ी के नए नए तरीके ढूंढा करते थे...उस वक्त मन बहलाने के लिए इतने साधन नहीं थे जितने आज नजर आते हैं...पर इतना जरुर था कि कमरे के एक कोने में रखा टेलीविजन हमारे सपनों को नई उड़ान देता था...लेकिन वो उड़ान भी बिजली के आने जाने के साथ हिचकोले खाती...दिल बहलाने के लिए पड़ोस में रहने वाले अंकल के पास चले जाते...लेकिन वहां भी बचपन कोई ठौर नहीं तलाश पाता...उसी दौर में कॉमिक्स का कीड़ा लगा...जिसने एक बार फिर हमारे सपनों को नई उड़ान दी...जहां चंद पन्नों में पूरा संसार चुटकियों में सिमट जाता...इसमें जोश था...तो हौसलों की मिसाल भी...पहली बार दर्द और दुख को भी हमने यहीं समझा...कॉमिक्स की इसी दुनिया में हमारा वास्ता उस किरदार से पड़ा...जिसका नाम चाचा चौधरी था...जिनके बारे में हम कहा करते थे कि चाचा चौधरी पड़ोस वाले अंकल से भी ज्यादा होशियार थे...कार्टून की दुनिया के उस अमर किरदार की याद आज इसलिए भी ज्यादा आ रही है...क्योंकि इसे जन्म देने वाले...और इसमें जान फूंकने वाले प्राण साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे...प्राण साहब का पूरा नाम प्राण कुमार शर्मा था...जिनका जन्म 15 अगस्त 1938 को पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था...उनके करियर की शुरुआत 60 के दशक में दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबार मिलाप के लिए कार्टून बनाने से की...उनके बनाए कार्टून चाचा चौधरी और मंगल ग्रह से आए साबू घर घर में चर्चा का विषय बन गए....प्राण साहब की प्रासंगिकता केवल चाचा चौधरी तक ही सीमित नहीं रही...उनके कालजयी कार्टूनों में चुलबुली पिंकी...रमन और श्रीमती जी भी थे...जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं...लेकिन चाचा चौधरी की बात ही निराली थी...उस दौर के बच्चों के लिए चाचा चौधरी उतने ही वास्तविक थे...जितने पड़ोस के कोई ताऊ...लेकिन पड़ोस के ताऊ की तरह पगड़ी पहनने वाले चाचा चौधरी की खासियत उस पगड़ी के नीचे उनका वो दिमाग था...जो उस जमाने से कंप्यूटर से तेज भागता रहा...जिस जमाने में भारत में कंप्यूटर की चर्चा शुरू भर हुई थी...चाचा चौधरी का किरदार प्राण साहब ने सबसे पहले हिंदी बाल पत्रिका लोटपोट के लिए गढ़ी...जो बाद में स्वतंत्र कॉमिक्स के तौर पर बहुत मशहूर हुई...देखते ही देखते प्राण साहब कार्टून के आसमान पर चमकता सितारा बन गए...बाद में उन्हे भारत के वॉल्ट डिजनी की उपाधि से भी नवाजा गया...लेकिन उनके निधन के बाद अचानक से हमारे सामने बचपन की वो धुंधली तस्वीरें ताजा हो गईं...जिन पर उस दौर के हमारे साथियों को बहुत नाज होगा...पूरी गर्मी की छुट्टियां इसी उधेड़बुन में निकल जाती थीं कि इस बार चाचा चौधरी के कितने कॉमिक्स पढ़े...क्योंकि तब कॉमिक्स खरीदकर नहीं किराए पर लेकर पढ़े जाते थे...उस वक्त एक कॉमिक्स का किराया 20 पैसे होता था...जिसके लिए बचपन में बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती थी...कई बार तो चाचा चौधरी के तेज दिमाग को पढ़ने के लिए काफी दूर भी जाना पड़ता था...चुनौतियां बहुत थीं...लेकिन बचपन कभी बेबस नजर नहीं आया...शुरुआती दिनों में एक दो घंटे कॉमिक्स में डूबने के बाद ऐसा चस्का लगा कि पूरा दिन पीठ सीधी किए हम यार दोस्त कई कॉमिक्स चाट जाते...चाचा चौधरी की कहानी इतनी रोचक और ज्ञानवर्धक थी...कि इसमें सामाजिक बुराईयों का समाधान करने की सीख मिलती...दायरे टूटने लगे...कॉमिक्स की चहारदीवारियों से बाहर निकल वो किस्से कहानियां अब बड़े बड़ों को सोचने पर मजबूर कर देतीं...हमारे सवालों और शैतानियों से परेशान मां भी ताने मारने लगती...उसे तो टेलीविजन और पड़ोस की आंटी से बदकही छोड़ हमारी दुनिया समझ ही नहीं आती...पिता जी भी शाम को घर आने के बाद एक बार डांट पिलाना अपना फर्ज समझते...लेकिन हम तो अपनी ही धुन में मगन थे...हर सुबह चुनौती इसी बात की होती कि नया कॉमिक्स पढ़ने के लिए पैसों का जुगाड़ कहां से होगा...लेकिन जैसे तैसे हो ही जाता था...इन कॉमिक्सों को पढ़ने के बाद ऐसा लगता मानो चाचा के साथ मंगल ग्रह से आया साबू भी हमारे पड़ोस में ही रहने लगा...छुट्टियां खत्म होने के बाद भी प्राण साहब के ये अमर किरदार हमारे जहन से नहीं जाते...स्कूल में बात बात में चाचा चौधरी...साबू...पिंकी और रमन की बातें यूहीं छिड़ जातीं...कई बार तो मास्टर जी भी हमारी कल्पनाओं पर भड़क जाते...शिकायत घर तक पहुंचती...लेकिन मां और पिताजी भी हमारी आदतों से मजबूर थे...जैसे जैसे बचपन जवानी की दहलीज पर पहुंच रहा था...वैसे वैसे हम चाचा चौधरी और दूसरे कार्टून किरदारों से दूर होते चले गए...लेकिन यादें कभी दिल से भुलाई नहीं जा सकीं...जमाना इंटरनेट का आया तो लगा सोच को और विस्तार मिलेगा...लेकिन बीते 10 सालों में हमने सोच को एक कमरे तक सिमटते भी देखा...आज का बचपन कल्पनाओं की उड़ान तो भरता है...लेकिन भविष्य में अतीत पर इतराने के लिए उनके पास कुछ ऐसा नहीं होगा...जिस पर हम गर्व महसूस करते हैं...इस दौर में कई किस्से-कहानियां...और किरदारों का जन्म हुआ...लेकिन वो अपनी अमिट छाप छोड़ने में बहुत हद तक कम ही सफल नजर आ रहे हैं...5 अगस्त को चाचा चौधरी को प्राण देने वाले प्राण साहब का एक लंबी बीमारी के बाद निधन हुआ तो लगा कि जैसे हमारे बचपन के उन कार्टून किरदारों का दिल ही टूट गया...हममें से जिसने भी उनके इस दुनिया से चले जाने की खबर जहां भी सुनी...अपने आस पास उन्ही किरदारों को रोते सुना...लगा मानो कम्यूटर से तेज दिमाग चलाने वाले...चाचा चौधरी का पूरा शरीर ही सुन्न पड़ गया...मंगल ग्रह से धरती पर अपनी दिलेरी दिखाने के लिए अवतरित हुआ साबू भी बेसहारा नजर आने लगा...पिंकी और बिल्लू भी अपनी शैतानियों को भूल हमेशा के लिए जड़ से हो गए...तो श्रीमती जी के चेहरे पर सन्नाटा छा गया...कार्टून की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले प्राण साहब के निधन के बाद उन्हे श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगने लगा...रंग बिरंगे कार्टूनों और अलग अलग किस्मों की मुद्राएं लिए तस्वीरों से फेसबुक के पन्ने पट गए...इन छवियों में तमाम वही चर्चित चरित्र थे...जिन्हे प्राण साहब ने अपनी बेजोड़ कल्पनाशीलता से गढ़ा था...फेसबुक के जमाने में ऐसा होना आम बात है...लेकिन आज के दौर के बच्चों को ये जरूर चौंकाने वाला लगा...ऐसा लगा जैसे कोई लोकप्रिय अभिनेता या गायक हमारे बीच से चला गया हो...अपने बचपन के दिनों में हमने कभी प्राण साहब को तलाशने की कोशिश नहीं की...और ना ही कभी उनके बारे में जानने की...बेशक वो अभिनेता नहीं थे और ना ही कोई गायक...लेकिन आज करीब 20 साल गुजरने के बाद वो हमारे लिए इन सबसे भी कहीं बढ़कर नजर आ रहे हैं...कहते हैं कि बच्चों के लिए काम करने वालों को सम्मान मिले या ना मिले...प्यार बहुत मिलता है...और प्राण साहब के साथ भी यही है...क्योंकि उनकी याद एक पीढ़ी के लिए उसके बचपन की याद है...जिन दोस्तों का बचपन 20वीं सदी के आठवें और नौवें दशक में बीता...उनके लिए चाचा चौधरी महज कोई कार्टून किरदार नहीं...पहली बार जब चाचा चौधरी का कॉमिक्स पढ़ा तबसे लेकर आज तक दुनिया में कई उतार चढ़ाव आए...कभी जिंदगी संघर्षों के बीच फंसी नजर आई...तो कभी बिना लगाम के मंजिल की तलाश में सरपट दौड़ती...लेकिन प्राण साहब के इस दुनिया से अलविदा कहने के बाद इन 20 सालों का सफर जैसे उनके रचे कार्टूनों के ईर्द गिर्द सिमटा नजर आया...भारत के वॉल्ड डिजनी कहे जाने वाले इस महान कार्टूनिस्ट को भले ही कोई याद रखे या ना रखे...लेकिन हमारी पीढ़ी के लोग कभी इन्हे भुला नहीं पाएंगे...क्योंकि जिस दौर में हमारा बचपन गुजरा...उस दौर में भले ही कंप्यूटर के किस्से नहीं थे...लेकिन प्राण साहब के अमर किरदार चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से तेज जरुर चलता था... विकास यादव टीवी पत्रकार

Sunday, December 18, 2011

खामोश हो गये गरीबों के व्यास


अदम गोंडवी..वो कलम के सिपाही तो नहीं थे,लेकिन उनकी कलम की धार तलवार से कम भी नहीं थी.उनका हर एक शब्द आज की दोगली सियासत की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी होता था.उनकी रचनाएं अंतर्मन में तूफान पैदा कर देती थीं.पेश से किसान अदम जी की लेखनी हमेशा आम आदमी के ईर्द गर्द ही घूमती नजर आई.उनकी हर एक रचना आज की घटिया राजनीति और राज्य व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा होता था. तरक्की और विकास के ढिंढोरे से कोसों दूर उनकी कविताएं दो वक्त की रोटी के लिए जूझते आम आदमी के दर्द को उकेरती थी.आज गोंडवी जी के निधन पर मुझे सुधाकर जी से किया हुआ एक वादा याद आ गया,गोंडवी जी से मेरी पहली मुलाकात(उनकी रचनाओं को पढ़ने का सौभाग्य)सुधाकर जी ने ही कराई थी.ये उनकी लेखनी का ही जादू था कि पहली ही मुलाकात में मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक बन बैठा.उनको पढ़ते पढ़ते हम अक्सर आम आदमी के जीवन संघर्ष की गहराईयों में खो जाते और जब आम आदमी का दर्द उनकी रचनाओं से निकलकर बाहर आता तो कुछ ना कर पाने की एक लंबी खामोशी हमें हर सवाल का जवाब दे देती.फ्रांस के प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो ने कहा था"a man is born free but everywhere he is in chain" सदियां आईं और चली गईं लेकिन आम आदमी के हालात बद से बदतर होते चले गये.क्या लोकतंत्र क्या तानाशाही जिसे मौका मिला सत्ता की भूख ने सबसे अधिक आम आदमी के पेट पर ही लात मारी.
आज अदम जी हमारे बीच नहीं हैं,लेकिन उनकी रचनाएं हमेशा दिलों में तूफान पैदा करती रहेगी

विकास यादव
(टीवी पत्रकार,हैदराबाद)

Saturday, May 21, 2011

सियासतनामा...


मैं दहशतगर्द था मरने पर बेटा बोल सकता है
हुकुमत के इशारे पर तो मुर्दा बोल सकता है
हुकुमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है
कई चेहरे अभी तक मुहजबानी याद हैं इसको
कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूंगा बोल सकता है
अदालत में गवाही के लिए लाशें नहीं आतीं
वो आंखें बुझ चुकी हैं फिर भी चश्मा बोल सकता है
बहुत सी कुर्सियां इस मुल्क में लाशों पर रखी हैं
ये वो सच है जो झूठे से भी झूठा बोल सकता है

Tuesday, May 17, 2011

लाश...नहीं, राख पर सियासत...


राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा ये बता पाना बेशक मुश्किल है,लेकिन चुनावी समर में किसकी क्या औकात है ये बताने की बिल्कुल भी जरुरत नहीं.भट्टा पारसौल में किसान आंदोलन के बाद भड़की आग इस कदर विकराल हुई कि नेताओं के वारे न्यारे हो गये.जिसको देखो वही लंगोट कसकर किसानों का मसीहा बनने निकल पड़ा.जमाना युवाओं का है सो इस कतार में कांग्रेस के तथाकथित युवराज राहुल गांधी ने बाजी मार ली और नोएडा प्रशासन को भनक लगने से पहले ही गांव में डेरा जमा लिया.राहुल गांव में कैसे पहुंचे ये भले ही वहां के लोगों के लिए एक यक्ष प्रश्न हो,लेकिन यूपी की मुखिया मायावती के लिए किसी तमाचे से कम नहीं था.कांग्रेसियों की नजर में अब भट्टा पारसौल लंका बन चुकी थी तो राहुल गांधी उनके अंगद.सो माया के गढ़ में अंगद ने अपने पैर कुछ यूं जमाये कि यूपी सरकार को उसे उखाड़ने में करीब 19 घंटे लग गये.इन 19 घंटों में जो कुछ हुआ वो ये बताने के लिए काफी था कि मिशन 2012 की तैयारियों में जुटी इन पार्टियों को किसानों की भावनाओं से कुछ लेना देना ही नही है.उधर मौके की नजाकत का फायदा उठाकर यूपी में दूसरे विपक्षी दलों ने भी अपनी ताल ठोंकनी शुरू कर दी.राजनाथ गाजियाबाद में एक दिन के अनशन पर बैठे तो तमाम दूसरे नेता मेरठ और बुलंदशहर सहित कई शहरों में गिरफ्तारियां दे रहे थे.इसी बीच राजनीति के शकुनि दिग्विजय सिंह ने अपनी चाल चलते हुए राहुल के कानों में वो मंतर मारा कि राहुल सीधे भट्टा पारसौल के कुछ किसानों के साथ प्रधानमंत्री से मिलने उनके आवास पहुंच गये और उन्हे गांव में राख के ढेर में नरकंकाल दबे होने की बात बताते हुए पूरे मामले की जांच की बात कही.जिसके बाद यूपी की सियासत में उबाल आना लाजमी था और हुआ भी वहीं, दोनों तरफ से बयानों के दौर शुरू हुए और मामला आगरा के फोरेंसिक लैब तक पहुंच गया जहां राख से लिए गये नमूनों को जांच के लिए भेज दिया गया.अब आप ही बताईये किसानों के हक की लड़ाई देखते ही देखते किस तरह से सियासी पचड़ों में फंसी उसका कोई ओर छोर भी है...

Saturday, December 18, 2010

हौसलों की उड़ान....

होके मायूस ना यूं शाम से ढलते रहिए
ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए
एक ही पांव पे ठहरोगे तो थक जाओगे
धीरे धीरे ही सही दोनों पांव पे चलते रहिए

Sunday, September 26, 2010

रिश्तों की डोर..



दो वक्त की रोटी और सर पे साया भी है
फिर ये चंचल मन क्या कुछ अभी गंवाया भी है
घर से इतनी दूर आये चार पैसा कमाने
जिंदगी ने पैसों के सिवाय बहुत कुछ सिखाया भी है
उलझता है मन कभी इस दौड़भाग की जिंदगी से
आज भी क्या कुछ खोया, कुछ पाया भी है
बड़े अजीब हैं वो लोग जो मुहब्बत के नाम से घबराते हैं
हमने तो हर उस शख्स से प्यार किया जिन्होने दिल दुखाया भी है
डर लगता है मुझे, जो कभी मैं..मैं से मिला
अहंकार ही है जिसने अपनों का साथ छुड़ाया भी है
क्या सोचते हैं वो लोग जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है
इस रिश्ते से भी प्यारा एक रिश्ता है
जो हमें अपनों के करीब लाया भी है

छू के मत देखना...


देवता है कोई हममे न फरिश्ता कोई
छू के मत देखना हर रंग उतर जाता है
मिलने जुलने का सलीका है जरूरी वर्ना
आदमी चंद मुलाकातों में ही मर जाता है