Thursday, June 30, 2016
अथ श्री महा'प्रदेश' कथा...
धर्म और जाति के महायुद्ध के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर लौट आया है रामायण और महाभारत काल.. किसी को उम्मीद है कि इस बार के चुनाव में ‘राम’ की घर वापसी हो जाएगी.. तो कोई कुल और जाति की हैसियत देख ‘कान्हा’ और ‘दाऊ’ पर दांव खेल रहा है.. इस बार के चुनाव में आपको ‘सुदामा’ भी नजर आएंगे.. तो ‘सबरी’ से बैर रखने वाले उसके जूठे बेर भी खाएंगे.. शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से हुई जब अप्रैल महीने में खबर आई कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को केशव मिल गए.. ये वो केशव नहीं हैं जिन्होने कंस का वध किया.. और ना ही वो जिनकी दिवानी मथुरा की गोपियां थीं.. बल्कि चुनावी बिसात पर ऐसे महापुरुषों की महानता का पैमाना जाति के आधार पर तय किया जाता है.. यूपी में बीजेपी के केशव का पूरा नाम केशव प्रसाद मौर्य है.. जो कोइरी समाज से आते हैं.. कोइरी समाज उस पिछड़ा वर्ग का हिस्सा है.. जो यूपी का सबसे बड़ा समूह और कुल आबादी का करीब 40 फीसदी है.. एक तरह से प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग की भूमिका काफी अहम है.. जिसमें यादव, जाट और कुर्मी प्रमुख हैं.. यादवों की कुल आबादी करीब 10 फीसदी है.. जबकि जाट करीब 7 फीसदी और कुर्मी प्रदेश की कुल आबादी का करीब 3 फीसदी हैं.. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी को गैर यादव जातियों में कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा जातियों का वोट मिला था.. केशव प्रसाद मौर्य राजनीति के बहुत दिग्गज खिलाड़ी तो नहीं हैं.. लेकिन हां वो जिस पार्टी से आते हैं वहां लोहे को सोना बनाने वाला पारस पत्थर जरुर है. ये बात और है कि दिल्ली और बिहार में पारस पत्थर अपनी शक्तियां खो चुका था.. लेकिन असम में बीजेपी की जीत ने इसे फिर से चार्ज कर दिया.. शायद इतना कि राजनाथ सिंह को फिर श्रीराम याद आने लगे.. कहने लगे कि अगले साल के विधानसभा चुनाव में 14 साल का वनवास खत्म होगा.. घर वापसी बीजेपी की होगी या राम की ये तो राजनाथ जानें मगर इतना तो तय है कि उत्तर प्रदेश में इस बार सियासी घमासान अपने चरम पर रहने वाला है.. अगर ऐसा ना होता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इलाहाबाद में प्रदेश की जनता से ये ना कहना पड़ता कि आप हमें 5 साल का मौका दीजिए, अगर हम काम नहीं कर पाए तो लात मारकर सत्ता से निकाल दीजिएगा.. देश के सबसे बड़े और राजनीतिक महत्व से सबसे अहम राज्य में सत्ता सुख के लिए कमोबेश ये बेचैनी सभी राजनीतिक दलों में देखने को मिल रही है.. कहीं पार्टी के मुखिया वोट बैंक के लिए अपने ही मायाजाल में उलझते नजर आ रहे हैं तो कहीं मोहरे हवाओं का रुख भांप रहे हैं.. सीटों के गुणा-गणित में नए नए सिद्धांत सामने आ रहे हैं.. कल तक जो पार्टी गुंडों से पीछा छुड़ाने की बात करती थी.. वहां माफियाओं की आरती की जा रही थी.. लखनऊ से खबर आई कि मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का सपा में विलय हो गया.. वो भी अखिलेश यादव की नाक के नीचे.. वही अखिलेश जिन्होने 2012 विधानसभा चुनाव से पहले डीपी यादव को पार्टी में लेने से मना कर दिया था.. और जनता के बीच ये संदेश देने की कोशिश की थी कि उनके रहते सपा में गुंडे-माफियाओं की जगह नहीं.. हालांकि अखिलेश यादव के विरोध के बाद विलय रद्द कर दिया गया.. लेकिन चर्चाओं का बाजार गर्म है कि जिस तरह से मोदी इफेक्ट यूपी में बढ़ रहा है उससे सपा की बेचैनी भी बढ़ने लगी है लिहाजा वो अपने मुसलमान वोट बैंक को किसी भी कीमत पर छिटकने नहीं देना चाहती.. वोट बैंक के इसी गुणा-गणित के एक और दिग्गज खिलाड़ी बनकर उभरे स्वामी प्रसाद मौर्य.. जिनकी गिनती चंद दिनों पहले तक मायावती के भरोसेमंद योद्धाओं में होती थी लेकिन अब वो गद्दार हैं.. स्वामी प्रसाद मौर्य ने अचानक बसपा से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया था.. शायद उनकी इस गद्दारी की वजह वो लहर हो.. जिस पर सवार होकर वो सत्ता के गलियारों में बने रहना चाहते हैं.. जाति और धर्म पर आधारित राजनीति वाले इस प्रदेश में करीब 21 फीसदी दलित.. 40 फीसदी पिछड़ा वर्ग.. मुसलमान करीब 18 फीसदी और सवर्ण करीब 20 फीसदी हैं.. लेकिन सत्ता उसी के हाथ लगी है जो अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ अति पिछड़ा वर्ग और दलितों के वोट बैंक में सेंधमारी कर पाया है.. इस फॉर्मूले को सोशल इंजीनियरिंग कहते हैं जिसने कभी मायावती तो कभी अखिलेश की प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई.. याद कीजिए तब बीजेपी दूर दूर तक कहीं नहीं थी.. लेकिन केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद हालात दूसरे हैं.. भूल जाइए 2012 के विधानसभा चुनाव में इस ऐतिहासिक धरती पर क्या हुआ.. दिल थाम के इंतजार कीजिए चुनावी सरगर्मियों के शुरू होने का.. क्योंकि इस बार की जंग में बहुत कुछ नया होने वाला है.
विकास यादव
टीवी पत्रकार
Thursday, September 11, 2014
हिंदुस्तान के माथे पर कलंक !
Wednesday, September 10, 2014
ये कैसा ‘माया’ मोह
नहीं रहे चाचा चौधरी के ‘प्राण’
Sunday, December 18, 2011
खामोश हो गये गरीबों के व्यास

अदम गोंडवी..वो कलम के सिपाही तो नहीं थे,लेकिन उनकी कलम की धार तलवार से कम भी नहीं थी.उनका हर एक शब्द आज की दोगली सियासत की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी होता था.उनकी रचनाएं अंतर्मन में तूफान पैदा कर देती थीं.पेश से किसान अदम जी की लेखनी हमेशा आम आदमी के ईर्द गर्द ही घूमती नजर आई.उनकी हर एक रचना आज की घटिया राजनीति और राज्य व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा होता था. तरक्की और विकास के ढिंढोरे से कोसों दूर उनकी कविताएं दो वक्त की रोटी के लिए जूझते आम आदमी के दर्द को उकेरती थी.आज गोंडवी जी के निधन पर मुझे सुधाकर जी से किया हुआ एक वादा याद आ गया,गोंडवी जी से मेरी पहली मुलाकात(उनकी रचनाओं को पढ़ने का सौभाग्य)सुधाकर जी ने ही कराई थी.ये उनकी लेखनी का ही जादू था कि पहली ही मुलाकात में मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक बन बैठा.उनको पढ़ते पढ़ते हम अक्सर आम आदमी के जीवन संघर्ष की गहराईयों में खो जाते और जब आम आदमी का दर्द उनकी रचनाओं से निकलकर बाहर आता तो कुछ ना कर पाने की एक लंबी खामोशी हमें हर सवाल का जवाब दे देती.फ्रांस के प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो ने कहा था"a man is born free but everywhere he is in chain" सदियां आईं और चली गईं लेकिन आम आदमी के हालात बद से बदतर होते चले गये.क्या लोकतंत्र क्या तानाशाही जिसे मौका मिला सत्ता की भूख ने सबसे अधिक आम आदमी के पेट पर ही लात मारी.
आज अदम जी हमारे बीच नहीं हैं,लेकिन उनकी रचनाएं हमेशा दिलों में तूफान पैदा करती रहेगी
विकास यादव
(टीवी पत्रकार,हैदराबाद)
Saturday, May 21, 2011
सियासतनामा...

मैं दहशतगर्द था मरने पर बेटा बोल सकता है
हुकुमत के इशारे पर तो मुर्दा बोल सकता है
हुकुमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है
कई चेहरे अभी तक मुहजबानी याद हैं इसको
कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूंगा बोल सकता है
अदालत में गवाही के लिए लाशें नहीं आतीं
वो आंखें बुझ चुकी हैं फिर भी चश्मा बोल सकता है
बहुत सी कुर्सियां इस मुल्क में लाशों पर रखी हैं
ये वो सच है जो झूठे से भी झूठा बोल सकता है
Tuesday, May 17, 2011
लाश...नहीं, राख पर सियासत...
राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा ये बता पाना बेशक मुश्किल है,लेकिन चुनावी समर में किसकी क्या औकात है ये बताने की बिल्कुल भी जरुरत नहीं.भट्टा पारसौल में किसान आंदोलन के बाद भड़की आग इस कदर विकराल हुई कि नेताओं के वारे न्यारे हो गये.जिसको देखो वही लंगोट कसकर किसानों का मसीहा बनने निकल पड़ा.जमाना युवाओं का है सो इस कतार में कांग्रेस के तथाकथित युवराज राहुल गांधी ने बाजी मार ली और नोएडा प्रशासन को भनक लगने से पहले ही गांव में डेरा जमा लिया.राहुल गांव में कैसे पहुंचे ये भले ही वहां के लोगों के लिए एक यक्ष प्रश्न हो,लेकिन यूपी की मुखिया मायावती के लिए किसी तमाचे से कम नहीं था.कांग्रेसियों की नजर में अब भट्टा पारसौल लंका बन चुकी थी तो राहुल गांधी उनके अंगद.सो माया के गढ़ में अंगद ने अपने पैर कुछ यूं जमाये कि यूपी सरकार को उसे उखाड़ने में करीब 19 घंटे लग गये.इन 19 घंटों में जो कुछ हुआ वो ये बताने के लिए काफी था कि मिशन 2012 की तैयारियों में जुटी इन पार्टियों को किसानों की भावनाओं से कुछ लेना देना ही नही है.उधर मौके की नजाकत का फायदा उठाकर यूपी में दूसरे विपक्षी दलों ने भी अपनी ताल ठोंकनी शुरू कर दी.राजनाथ गाजियाबाद में एक दिन के अनशन पर बैठे तो तमाम दूसरे नेता मेरठ और बुलंदशहर सहित कई शहरों में गिरफ्तारियां दे रहे थे.इसी बीच राजनीति के शकुनि दिग्विजय सिंह ने अपनी चाल चलते हुए राहुल के कानों में वो मंतर मारा कि राहुल सीधे भट्टा पारसौल के कुछ किसानों के साथ प्रधानमंत्री से मिलने उनके आवास पहुंच गये और उन्हे गांव में राख के ढेर में नरकंकाल दबे होने की बात बताते हुए पूरे मामले की जांच की बात कही.जिसके बाद यूपी की सियासत में उबाल आना लाजमी था और हुआ भी वहीं, दोनों तरफ से बयानों के दौर शुरू हुए और मामला आगरा के फोरेंसिक लैब तक पहुंच गया जहां राख से लिए गये नमूनों को जांच के लिए भेज दिया गया.अब आप ही बताईये किसानों के हक की लड़ाई देखते ही देखते किस तरह से सियासी पचड़ों में फंसी उसका कोई ओर छोर भी है...
Saturday, December 18, 2010
हौसलों की उड़ान....
होके मायूस ना यूं शाम से ढलते रहिए
ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए
एक ही पांव पे ठहरोगे तो थक जाओगे
धीरे धीरे ही सही दोनों पांव पे चलते रहिए
ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए
एक ही पांव पे ठहरोगे तो थक जाओगे
धीरे धीरे ही सही दोनों पांव पे चलते रहिए
Sunday, September 26, 2010
रिश्तों की डोर..

दो वक्त की रोटी और सर पे साया भी है
फिर ये चंचल मन क्या कुछ अभी गंवाया भी है
घर से इतनी दूर आये चार पैसा कमाने
जिंदगी ने पैसों के सिवाय बहुत कुछ सिखाया भी है
उलझता है मन कभी इस दौड़भाग की जिंदगी से
आज भी क्या कुछ खोया, कुछ पाया भी है
बड़े अजीब हैं वो लोग जो मुहब्बत के नाम से घबराते हैं
हमने तो हर उस शख्स से प्यार किया जिन्होने दिल दुखाया भी है
डर लगता है मुझे, जो कभी मैं..मैं से मिला
अहंकार ही है जिसने अपनों का साथ छुड़ाया भी है
क्या सोचते हैं वो लोग जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है
इस रिश्ते से भी प्यारा एक रिश्ता है
जो हमें अपनों के करीब लाया भी है
छू के मत देखना...
कल की आवाज...
Friday, September 24, 2010
मेरा गांव...

अरसा गुजर गया मैंने वो खुशहाली नहीं देखी
गांव में अब लोगों की वो चहलकदमी नहीं देखी
वो भी क्या वक्त था...
जब किसी के चेहरे पर मैने बेरुखी नहीं देखी
अरसा गुजर गया मैने वो खुशहाली नहीं देखी
बूढ़ी दादी की शक्ल आज भी ढूंढ़ता हूं मैं
शायद किसी ने उनकी वो हंसी नहीं देखी
गांव में कोयल की कू से मन झूम जाता था मेरा
शायद किसी ने वैसी हरियाली नहीं देखी
दादा की मेहनत देखकर दंग रह जाता था मैं
हमने सूरज की वो तपती गर्मी नहीं देखी
अरसा गुजर गया मैंने वो खुशहाली नहीं देखी
गांव में अब वो लोगों की चहलकदमी नहीं देखी
Thursday, September 23, 2010
मंजिल की तलाश में...

मंजिल की तलाश में हर शख्स
सफर करता है पूरी रात
इस उम्मीद में
कि इस काली रात के बाद
आयेगी वो नयी सुबह
जिसकी है उसे तलाश
लेकिन इस काली रात की चादर
इतनी लंबी होगी
इसका नहीं था उसे एहसास
जागते जागते सो जाता है वो
फिर जब नींद खुलती है तो डर जाता है वो
फिर भी एक आस लिए
चल पड़ता है अपनी मंजिल की तलाश में
शायद मनुष्य का यही सबसे बड़ा गुण है
जो उसे निरंतर
जीवन की इस सच्चाई (संघर्ष)
से भी लड़ने को प्रेरित करता है
एक लंबे जीवन संघर्ष के बाद
आखिर मिल ही जाती है
उसे एक आशा की किरण
लेकिन जिसकी मंजिल का सूरज
अभी भी अस्त है
वो भी इस कठिन राह पर चलते हैं
मिलेगी उन्हे भी उनकी मंजिल एक दिन
जिसकी उसे आज भी तलाश है
क्यूं होता है दर्द...

क्यूं होता है दर्द आदमी को
मन हो जाता है व्यथित
एक एक पल लगता है सालों जैसा
सपनों में भी
चले आते हैं वो लोग
जो बिछड़ गये हैं कहीं
बाकी है तो केवल उनकी याद
जो देती रहती है हमें दर्द
कई बार सोते सोते
उठ बैठता हूं मैं
मानो उसके स्पर्श ने ये एहसास दिलाया हो
कि मैं तुमसे दूर ही कब गया
ये तो तुम थे जिसने मुझसे इतनी उम्मीद की
अब समझ में आया
सारे दर्द की वजह क्या है
ना मैंने किसी से उम्मीद की होती
ना जल रहा होता इस विरह की आग में
अब तो लगता है
जैसे सब सही कहते हैं
गलती मेरी ही थी
जो मैने सोचा क्या था
और मुझे मिला क्या है
Tuesday, September 21, 2010
अयोध्या का सच..

अयोध्या..एक ऐसा शहर जहां की सुबह राम नाम से होती है तो शाम अजान के साथ ढलती है..लेकिन ६ दिसंबर १९९२ को जिस विवाद का जन्म हुआ..उसने ना सिर्फ इंसानियत को बल्कि देश के सियासी हालात को भी बेनकाब़ कर दिया..देखते ही देखते धार्मिक आस्था का केन्द्र ये शहर जंग का मैदान बन गया..ऐसा लग रहा है मानो तेजी से आये इस बदलाव पर अयोध्या ख़ुद से ये पूछ रहा हो कि क्या यही था मेरा भविष्य..सदियों का इतिहास विवाद की आंधी में किसी किताब के पन्ने की तरह फाड़कर फेंक दिया गया..राम नाम की धुन में रमे रहने वाले इस शहर की चमक फैली भी तो कैसे..पूछिए मत..जिन लोगों को हमारी संस्कृति और सभ्यता को दुनिया के नक्शे पर लाना चाहिए था..वही लोग धर्म और मज़हब के नाम पर देश को बांटने में लग गये..२४ सितंबर को बाबरी मस्जिद के मालिकाना ह़क का फैसला आयेगा..बेशक कुछ लोगों के चेहरे खिल उठेंगे..तो कुछ की मुस्कुराहट छिन जायेगी..लेकिन आने वाले वक्त में जब जब इतिहास के पन्नों को पलटा जायेगा..तब तब इसकी टीस हमारी नई पीढ़ियों के दिलों में तूफान पैदा करती रहेगी..
Wednesday, February 3, 2010
दिल तो बच्चा है जी...

मीडिया वाले भी कितना बेदर्द होते हैं, कहीं किसी दिल के टूटने की खनक हुई नहीं कि इनके कान बजने लगते हैं, और किसी जल्लाद की माफिक ये लोग हाथ धो के उस रिश्ते का पोस्टमार्टम करने बैठ जाते हैं, आब कल का ही एक वाकया ले लीजिये,ख़बर आई कि सानिया मिर्जा और सोहराब की सगाई टूट गई, ख़बर..ख़बर बनती इससे पहले ही सानिया और सोहराब के घर के बाहर फटीचर काल के कुछ टीवी पत्रकार मंडराने लगे, कंधे पर बड़ा सा पी डी १७० कैमरा और हाथों में चेनलों की आईडी लगे माईक, ऐसा लग रहा था कि इन लोगों ने दो टूटे दिलों की दास्तान सार्वजनिक करने का ठेका ले लिया हो, उधर फटीचर काल की टीवी पत्रकारिता के कुछ तथाकथित युवा पत्रकार अब सानिया के अकेलेपन का साथी बनने का बीड़ा उठा लिया हो, और अपना बायोडेटा सजाने में मशगूल हो गये थे, ये सब देखकर मैं एक पल के लिए हैरान रह गया, क्या यही है पत्रकारिता का असली चेहरा जिसका सपना पाले हम सब यहां आये थे, आखिर ये फटीचर युग के तथाकथित पत्रकार ख़बरों का चीरहरण कर साबित क्या करना चाहते हैं, क्या ये सब परोसकर हम अपने पेशे से वफादारी करने का दावा ठोंक सकते हैं, कुछ बुद्धिजीवी मानते हैं कि टीवी पत्रकारिता अभी शैशवाकाल के दौर से गुजर रही है, लेकिन आये दिन टीवी पत्रकारिता के इसी लड़कपने में नित नये खुलासे भी हो रहे हैं, कभी मुंबई आतंकी हमले में एकमात्र जिंदा पकड़ा गया आतंकी कसाब की खुराक पर हो रहे सालाना खर्च पर टीवी में चिंतन बैठक बुलाई जाती है, तो कभी देश में हॉकी के गिरते हालात पर लोग एसी कमरों में सूट बूट पहनकर लंबी लंबी बहस बाजियों को जन्म दिया जाता है, और ये सब हो रहा है टीवी पत्रकारिता के इसी बाल्यावस्था में, क्या सचमुच में टीवी पत्रकारिता का ये दौर एक बच्चे की माफिक खेलने कूदने का है, या फिर जानबूझकर ये खेल खेला जा रहा है, वहीं दूसरी ओर टीआरपी की मची होड़ में पत्रकारिता के टुच्चेपन की झलक साफ नजर आती है, ये तो आपको ही तय करना होगा कि ये हमारी टीवी पत्रकारिता का कौन सा दौर है, शैशवाकाल, या फिर फटीचर काल की फूहड़ झलक, ये तो वही बात हो गई कि पता तो सब कुछ है साहब लेकिन क्या करें गल्ती से मिस्टेक हो गई...
संप्रति - विकास यादव
टीवी पत्रकार
मोबाइल - ०९७०४३९०४८५
नोट - ये पत्रकार की निजी राय है
Thursday, January 14, 2010
An evening at etv news room(UP)

साथियों के नाम....
तारीख ३० जूलाई..दिन की दूसरी शिफ्ट बस कुछ ही पलों में मोर्चा संभालने वाली थी..लेकिन इससे पहले कि मेरे साथी गण मोर्चा संभालते..एक ख़ास विषय पर चर्चा का माहौल गरमाने लगा था..हांलाकि हम सभी एक मीडिया हाउस में काम करते हैं..लेकिन यहां चर्चा का विषय दिन की कोई बड़ी ख़बर नहीं थी..बल्कि ख़बरों में मसाला लगाकर परोसने वाले हमारे साथी..पिछले कई महीनों से उड़ रही प्रोबेशन की ख़बरों को लेकर आज भी आपस में उलझे पड़े थे...
बहरहाल जो सपना पिछले कई महीनों से हमारे साथियों की आंखों में चमक रहा था..उसके सच होने का वक्त आ गया था..साथियों ने अपने अपने मोर्चे संभाल लिये थे..हाथ तो माउस पर थे..लेकिन पूरा ध्यान मोबाइल फोन पर था..हर साथी इसी उम्मीद में बैठा था कि ना जाने कब मोबाइल एक मधुर धुन छेड़ दे..और खली पड़े खाते में एक भारी भरकम रकम गिर जाये..हम सब इन्ही खयालों में डूबे हुए थे..कि इतने में एक साथी के मोबाइल फोन पर बीप की ध्वनि सुनाई दी..इतने में सबकी निगाहें उस साथी की ओर उठने लगीं..आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था..भाई के खाते में १३००० रूपये गिर चुके थे..और इतनी रकम देखकर उसकी आंखें भी चौधियां गई थीं..
धीरे धीरे सबके फोन पर चेहरों को हरा कर देने वाले संदेश आने लगे..लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके मोबाइल फोन का नंबर वेतन देने वाले बैंक के पास मौजूद नहीं था..सो अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई जानने के लिए उनकी उत्सुकता बढ़ना लाजमी थी..अब धीरे धीरे शिफ्ट भी अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी..और ऐसे में साथियों के चेहरों पर जीत की खुशी साफ पढ़ी जा सकती थी..इधर रात अपने पूरे शबाब पर थी..तो उधर साथियों की ख़ुमारी भी बढ़ती जा रही थी..सबकी जुबां पर बस एक ही सवाल था कि जश्न की तैयारी कैसे की जाये..
बहरहाल नौजवानों के जश्न मनाने का तरीका तो आप भी जानते होंगे..इस मुद्दे पर बिना कोई बहस किये हमें साथियों के उज्जवल भविष्य की कामना करनी चाहिए..और जीवन में थोड़ा धैर्य रखने की नसीहत भी देना चाहिए...
सदैव आपका....
विकास यादव
सार - ईटीवी न्यूज में तय समय से बहुत बाद में हुए प्रोबेशन की सच्ची घटना पर आधारित
Saturday, February 28, 2009
दीदार करके देखते हैं...
(सुधाकर जी हमारी मित्रमंडली में बलरामपुर से ताल्लुक रखते हैं...पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा ज़िला बलरामपुर मशहूर शायर बेकल उत्साही..अली सरदार ज़ाफरी जैसी अज़ीम शख्सियतों की नज्मों से गुलज़ार है...साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार बलरामपुर से ही १९५७ में लोकसभा में नुमाइंदगी का मौका मिला था...खैर इन सबसे इतर सुधाकर जी वक्त-वक्त पर आपको अपनी लेखनी से रूबरू करवाते रहेंगे..तो लीजिए मेरे पहले ब्लॉग की पहली नज्म..जो उन्होंने मुझे भेंट की है)
सुना है उसके आने से बागों में बहार आ जाती है...
तो चलो क्यूं न उस बगिया के बागवान बनके देखते हैं..
सुना है रूप में वो हुस्न की देवी नज़र आती है...
तो चलो उस हुस्न के मंदिर में मन्नत मांगके देखते हैं..
ये भी सुना है कि कोई खाली हाथ नहीं लौटा उसके दरबार से...
तो चलो हम भी उसका दीदार करके देखते हैं....
सुधाकर सिंह
संप्रति- टीवी पत्रकार
तारीख- 28-02-2009
मोबाइल- 09396582442
सुना है उसके आने से बागों में बहार आ जाती है...
तो चलो क्यूं न उस बगिया के बागवान बनके देखते हैं..
सुना है रूप में वो हुस्न की देवी नज़र आती है...
तो चलो उस हुस्न के मंदिर में मन्नत मांगके देखते हैं..
ये भी सुना है कि कोई खाली हाथ नहीं लौटा उसके दरबार से...
तो चलो हम भी उसका दीदार करके देखते हैं....
सुधाकर सिंह
संप्रति- टीवी पत्रकार
तारीख- 28-02-2009
मोबाइल- 09396582442
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